सूरदास का वात्सल्य प्रेम
श्रीमती ममता सिंह1, डाॅ. वंदना कुमार2
1शोधार्थी, प. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर(छ.ग.)
2सहायक प्राध्यापक, शासकीय नागार्जुन स्नातकोत्तर विज्ञान महाविद्यालय, रायपुर(छ.ग.)
स्ूरदास जी कृष्णभक्त कवियों में सर्वोपरि स्थान रखते हैं। इन्होनें श्रीकृष्ण के बालरूप का ऐसा मनोहर रूप अंकित किया है कि देखते ही बनता है साथ ही श्रीकृष्ण के बाल्यकाल की एक-एक छवि, को ऐसे वर्णित किया है कि सम्पूर्ण दृष्य पाठको के समक्ष सजीव हो उठता है। कहते है कि उन्हें माता यषोदा का हृदय प्राप्त था, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने भी लिखा है कि ‘‘सूर अपनी बंद आँखो से वात्सल्य का कोना-कोना झाँक आए है।’’ सूरदास जी की वात्सल्य रचना का कोई जोड़ नही है।
वात्सल्य, माता यषोदा, श्रीकृष्ण, कृष्णभक्त, बालरूप
सूरदास जी का नाम कृष्णभक्ति की अजस्त्र धारा को प्रवाहित करने वाले श्क्त कवियों में सर्वोपरि है। श्गवान श्रीकृष्ण के अनन्य उपासक और ब्रजभाषा के श्रेष्ठ कवि महात्मा सूरदास हिन्दी साहित्य में अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान रखते है। इन्होने हिन्दी कविता को समृद्ध करने में जो योगदान दिया है, वह अद्वितिय है। सूर ने वात्सल्य, श्रृंगार, और शांत रसो को अपनाया है।
सूर ने अपनी प्रतिभा और कल्पना के सहारे कृष्ण के बाल रूप का अति सुंदर, सरस, सजीव और मनोवैज्ञानिक वर्णन किया है। बालको की चपलता, स्पर्धा, अभिलाषा, आकंक्षा का वर्णन करने में सूर ने अपनी कल्पना और कुषल लेखनी का परिचय दिया है। बालक कृष्ण की एक-एक चेष्टाओं के चित्रण में कवि की कमाल की सूक्ष्म निरिक्षण की दृष्टि एवं होषियारी देखने को मिलती है।
सूर ने अपनी कविता का विषय जीवन के विविध क्षेत्रों तक विस्तृत न करके वात्सल्य और श्रृंगार तक ही सीमित रखा। सूरदास का वात्सल्य वर्णन हिन्दी साहित्य की अनुपम निधि है। रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा हैः-‘‘ बाल सौन्दर्य एवं स्वभाव के चित्रण में जितनी सफलता सूर को मिली है, उतनी अन्य किसी को नहीं। वे अपनी बन्द आँखो से वात्सल्य का कोना-कोना झांक आए हैं।’’
सूरदास के वात्सल्य वर्णन में स्वाभाविकता, विविधता, रमणीयता एवं मार्मिकता है, जिसके कारण ये वर्णन अत्यन्त हृदयग्राही एवं मर्मस्पर्षी बन पड़े है। सूरदास जी के अनेक पद एक दूसरे से लताओं व वृक्षों की शंति गुंथे मिलते है। यषोदा के बहाने सूरदास जी ने मातृहृदय का ऐसा स्वाभाविक सरल और मनमोहक चित्र खींचा है जो अनुपम है, कभी-कभी तो ऐसा प्रतीत होता है कि सूरदास जी माता यषोदा का रूप लेकर बालकृष्ण की लीलाओं को स्वयं अपनी नेत्रो से देख रहें हों। किसी ने सत्य ही कहा है कि सूर को माता यषोदा का हृदय प्राप्त था।
सूरदास जी ने वात्सल्य के दोनो पक्षों संयोग और वियोग का अत्यंत ही सजीव चित्रण किया है। वात्सल्य के संयोग पक्ष में उन्होने एक ओर तो बालक कृष्ण की रूप माधुरी का चित्रण किया है तो दूसरी ओर बालोचित चेष्टाओं का मनोहारी वर्णन किया है, यथाः-
‘‘ हरिजू की बाल छवि कहौं बरनि।
सकल सुख की सींव कोटि मनोज सोभा हरनि।।’’
सूरदास के वात्सल्य प्रेम में गाए गए गीत किसी श्ी माँ के अपने पुत्र के प्रति वात्सल्य का प्रतिनिधित्व करते हैै, माता यषोदा श्ी श्रीकृष्ण को पालने में सुलाकर लोरी गाती हैः-
‘‘ जसोदा हरि पालने झुलावे,
हलरावे दुलराई मल्हावे, जोई सोई कछु गावे।
मेरे लाल को आउ निंदरिया, काहै न आनि सुवावे,
तू काहे नहिं बेगहि आवै, तोको कान्ह बुलावैं।।’’
माँ की लोरी सुनकर कृष्ण कभी अपनी पलकों को मूँद लेते है तो कभी अपने होठों को फड़काते हैः-
‘‘कबहूँ पलक हरि मूँद लेत है, कबहूँ अधर फरकावैं।’’
कृष्ण के शैषव, बाल किषोर और यौवन सभी अवस्थाओं का चित्रण सूर ने विलक्षण सौन्दर्यानुभूति के साथ किया है। मुख पर मक्खन लपेटे, घुटनियों के बल चलते हुए कृष्ण की सुकुमारता का मुग्ध कर लेने वाला चित्रण श्ी सूर ने किया है।
डाॅ. रामकुमार वर्मा ने कहा है किः-
‘‘ सूरदास ने षिषु और बाल-जीवन की प्रत्येक शवना का इतना गम्भीर अध्ययन किया है कि वे प्रत्येक परिस्थिति के चित्र बड़ी कुषलता और स्वाभाविकता से उतार सकते है। उन्होने कृष्ण और माँ यषोदा के हृदयों की शवना को इतने सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत किया है कि वे चिरन्तन और सत्य है।’’
बालक कृष्ण को देखकर माँ यषोदा सोचती हैः-
‘‘जसुमति मन अभिलाष करै,
कब मेरे लाल घुटुरूवनि रेगें,कब धरनी पग द्वैक धरे,
कब द्वै दाँत दूध के देखो, कब तोतरे मुख वचन झरे।’’
माता की इच्छा श्ी शीघ्र ही पूर्ण हो जाती हैः-
‘‘किलकत कान्ह घुटुरूवनि आवत
मनिमय कनक नन्द के आंगन बिम्ब पकरिवे धावत।’’
सूर ने कृष्ण की बाल-लीलाओं का ऐसा चित्ताकर्षक एवं मनोहारी चित्र अकिंत किया है कि देखते ही बनता है। कृष्ण घुटनो के बल चलने लगे है, उनके हाथों में मक्ख्न और मुख पर दही लगा हुआ है, पूरा शरीर मिट्टी से सना है, मस्तक पर गोरोचन का तिलक है और उनके घुंघराले बाल गालो पर बिखरे है, गले में बघनखे का कंठुला शोभायमान है। कृष्ण के इस सौन्दर्य को एक क्षण के लिए देखने श्र का सुख श्ी सात युगों तक जीने के समान हैः-
‘‘ सोभित कर नवनीत लिये।
घुटुरूनि चलत रेनु तन मण्डित, मुख दधि लेप किए।
कंठुला कंठ ब्रज केहरि नख, राजत रुधिर हिये।
धन्य सूर एकौ पल इहिं, सुख का सत कल्प जिये।’’
माँ के मन की लालसा व स्वपनो को श्ी सूर ने जीवंत ढंग से अपने पदो में उतारा है। कृष्ण को गिरते-पड़ते, ठुमुक-ठुमुक चलते देख माँ यषोदा को अपार सुख मिलता हैः-
‘‘चलत देखि जसुमति सुख पावै।
ठुमकि-ठुमकि पग धरनि रेंगत, जननी देखि दिखावै।’’
सूर ने बालको के हृदयस्थ मनोभावों का चित्रण श्ी बड़े मन से किया है। बालकों की खीझ, पारस्परिक प्रतिस्पद्र्धा, बुद्वि-चातुर्य, अपराध को छिपाने की प्रवृति, भोले-भाले तर्क, हठ आदि का विषद चित्रण सूर काव्य में मिलता है। माता यषोदा श्रीकृष्ण को दूध पीने के लिए किसी श्ी प्रकार मनाने की कोषिष करती हैं और कहती हैं कि दूध पीने पर तुम्हारी चोटी बढ़ जाएगी, कृष्ण चतुरता दिखाते हुए एक हाथ से चोटी पकड़कर दूसरे हाथ से दूध पीते है और पूछते हैंः-
‘‘ मैया कबहिं बढ़ेगी चोटी?
किती बार माहि दूध पिबत श्ई,यह अजहूं है छोटी।’’
वे माखन चोरी करते हुए रंगे हाथो पकड़े जाते है, मुख पर मक्खन लगा हुआ है फिर भी तर्क देकर स्वयं को निर्दोष प्रमाणित करना चाहते हैः-
‘‘मैया मैं नहिं माखन खायो।
ख्याल परे ये सखा सबै मिलि मेरे मुख लपटायो।।’’
स्ूरदास जी ने बालकों के आक्रोष का भी मनमोहक चित्रण प्रस्तुत किया है। बलराम कृष्ण के बड़े शई है और वह कृष्ण को यह कहकर चिढ़ाते है कि तू माता यषोदा का पुत्र नही है, तूझे तो मोल लिया गया है क्यूंकि माता यषोदा श्ी गोरी है और नन्द बाबा श्ी गोरे हैं, तो तू साँवला कैसे हो गया? श्रीकृष्ण माता यषोदा से षिकायत करते हुए कहते हैं किः-
‘‘मैया मोहि दाउ बहुत खिझायो
मोसौ कहत मोल को लीन्हो तू जसुमति कब जायो।’’
अभी तो माता यषोदा उन्हें जैसे-तैसे मना लेती है परन्तु वह पुनः चन्द्र खिलौना लेने के लिए मचल उठते हैंः-
‘‘मैया मैं तो चन्द्र खिलौना लैहों।
जैहों लोटि अबै धरनी पै तेरी गोद न ऐहौं।।’’
सूरदास जी ने जितनी सुन्दरता, सजीवता एवं तन्मयता से वात्सल्य के संयोग पक्ष का चित्रण किया है, उतनी ही खूबसूरती से वात्सल्य के वियोग पक्ष को श्ी वर्णित किया है। श्रीकृष्ण जब मथुरा के के लिए निकलते है तो माँ यषोदा का हृदय विकल हो जाता हैः-
‘‘जसोदा बार-बार यों शखे
है कोई ब्रज में हित हमारौ चलत गोपालहिं राखै।’’
सूर के वियोग वर्णन की सबसे बड़ी विषेषता है, उनका मनोवैज्ञानिक विष्लेषण। कृष्ण के मथुरा चले जाने के पष्चात माता यषोदा को अपने पुत्र की चिन्ता सताने लगती है, उन्हें लगता है कि जितना वो श्रीकृष्ण को, उनकी पसन्द-नापसन्द समझती है, कोई और नही समझ सकता है, इसीलिए वो देवकी को सन्देष श्ेजती हुई कहती हैः-
‘‘संदेसो देवकी सों कहियो
हौं तो धाय तिहारे सुत की कृपा करति ही रहियौ।
जदपि टेव तुम जानति है हौ तउ मोहि कहि आवै
प्रात होत मेरे लाल लड़ेते माखन रोटी शवै।।’’
सूर वात्सल्य के कुषल चितेरे है। बालकृष्ण की निर्मल छवि हर प्राणी को आकृष्ट करती है। वात्सल्य के माध्यम से सूरदास जी ने नारी के मातृत्व की महिमा को स्थापित किया है।
सूर के वात्सल्य वर्णन में तन्मयता,स्वाभाविकता, मनोवैज्ञानिकता एवं सहजता है। उन्होने केवल बाल-लीला का चित्रण ही नही किया अपितु बालको की मानसिक प्रवृति का मनोवैज्ञानिक वर्णन श्ी किया है। अतः हम यह कह सकते है कि सूर के वात्सल्य वर्णन मनोवैज्ञानिकता का पुट है।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने सूरदास के वात्सल्य वर्णन की प्रषंसा करते हुए लिखा हैः-‘‘आगे होने वाली श्रृंगार और वात्सल्य की उक्तियां सूर की जूठी सी जान पड़ती है।’’ निसन्देह सूरदास वात्सल्य के सम्राट है और उनका वात्सल्य वर्णन हिन्दी साहित्य की ऐसी अनुपम निधि है जिस पर हम गर्व कर सकते हैं।
सन्दर्भः
1. तिवारी, अशेक. प्रतियोगिता साहित्य, आगराः साहित्य श्वन
2. संपादक शुक्ल, चन्द्रप्रकाश. मध्यकालीन भक्तिकाव्यः पुनरावलोकन, इलाहाबादःराका प्रकाषन, 2001
Received on 05.02.2017 Modified on 14.03.2017
Accepted on 27.03.2017 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 5(1): Jan.- Mar., 2017; Page 12-14 .